Thursday, 5 January 2017

घर

वो घर अब कहाँ रहे
जिनमें जन्मा करतीं थीं
नित नई बुनावटें !
कुछ रिश्तों की
कुछ प्रेम की
कुछ लगन की
कुछ मिलन की
कुछ सबकुछ समेट कर
बन जातीं थीं ऊन की !

वो घर अब कहाँ रहे
जिनमें जन्मा करतीं थीं
अपनत्व की यादें !
कुछ भोर की
कुछ अँजोर की
कुछ राग की
कुछ अनुराग की
कुछ सबकुछ समेट कर
बन जातीं थीं परिवार की !

अब तो बच रह गईं हैं बस
चंद छत-ओ-दीवारें !
जहाँ चलती हैं बातें
कुछ विज्ञापनों की
कुछ माॅल की
कुछ नेताओं की
कुछ अभिनेताओं की
कुछ घुट-मिटकर बन जातीं हैं
बस................ 'बाजार की' !
निरी............... 'बाजार की' !!
केवल............. 'बाजार की' !!!


Monday, 24 October 2016

दीपावली की कहानी

आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊँ
दीपावली की अमर कहानी।
सुनकर तुम ये मत कहना
यह तो भैया बहुत पुरानी।
दीपावली आती हर वर्ष नयी
नित नई है उसकी यह कहानी।

अयोध्या के थे राजा राम
वन में जाकर रहते थे।
संग सीता और लक्ष्मण भ्राता
वचन पिता का भरते थे।

लंका का था राजा रावण
था वह बडा वीर-अभिमानी।
स्वर्ग लोक के देवता सारे
महल में उसके भरते थे पानी।

एक दिवस की बात यह
पाकर वन में सिया अकेली।
छल से बिठा निज रथ में
ले गया मूर्ख-अज्ञानी।

क्रोध भड़क उठा राम-लखण का
बात जब उन्होंने सब जानी।
खींची डोर निज धनुषों की
रावण से लोहा लेने की ठानी।

राम-लखन दोऊ भ्राता
रावण की सेना अनजानी।
महावीर हनुमान मिले तब
सुग्रीव ने भी सहायता करने की मानी।

सुग्रीव था किष्कंधा का राजा
वानर सेना थी उसकी अति भारी।
नल-नील-अंगद-जाम्बवंत
योद्धा थे उसके बड़े बलवानी।

बात-बात में बना पुल सागर पर
हुई रावण को तब हैरानी।
समझाया उसको खूब सभी ने
पर बात ना उसने झुकने की मानी।

मचा घमाशान कई दिनों तक
मिटे योद्धा अनगिण बलिदानी।
मेघनाद-कुम्भकरण ने भी तो
खूब की वानर सेना की हानि।

पर राम-लक्ष्मण के बाणों ने
उनको भी गति दे डाली।
तब निकला किले से राजा-रावण
था वह खूब दंभी-अभिमानी।

राम-रावण संग्राम छिड़ा तब
तीनों लोक में थी लाचारी।
धरती कांपती अंबर डोलता
चलते थे जब उनके वज्र भारी।

एक बाण बडा पैना
जाकर लगा रावण की नाभि में।
मूर्छित होकर गिरा धूलि में
हुआ तत्काल राम को प्यारा।

थी वह तिथि दशमी की
जब वह महाबली दशानन हारा।
इसीलिए तो हमने तब से
इसे दशहरा के रूप में जाना।

चौदह वर्ष का वनवास निबाह तब
राम-लखन-सिया अयोध्या आये।
उनके स्वागत में ही तो
उस दिन थे सबने दीप जलाये।

राम-लखन और भरत-शत्रुघन
प्रजा वसियों ने गले लगाये।
थी कार्तिक आमावश्या उस दिन
जिसको अब हम दीपावली मनाऐं।

दीपावली है त्यौहार प्रेम का
त्याग- तपस्या और बलिदान का।
मंत्र जरा यह अपनाकर देखो
दीपावली होगा हर दिन जीवन का।

                    ***


Wednesday, 18 March 2015

नॉनस्टॉप-बचपन

ओए चल ना
खिली-खिली धूप में
छत पर बैठेंगे।
आसान में उड़ते
कबूतर को देखकर
सपने बुनेंगे।
रंग अगर चुक गए
तितली से ले लेंगे।

चल, सौंधी-सौंधी हवाओं में
मेंढ़ पर बैठेंगे।
खेत से तोड़कर
गन्ना चुसते
बातें घडेंगे।
आ,गन्ने की जड़ उछालकर
बेर तोड़ेंगे।

चल, हाथों में हाथ लेकर
खेतों में घूमेंगे।
नाली में चलते
ट्यूबवेल के पानी में
छपाछप खेलेंगे।
आजा,फूलों पर मँडराती
तितलियाँ पकड़ेंगे।

चल, मटर के खेत से
तोड़ फलियाँ खाएँगें।
चने की पत्तियों से
नरम-नरम डोडियों से
नमक चुराएँगे।
आ ना, मूली-शलगम उखाड़कर
चबा-चबाकर खाएँगें।

चल, पुआल की झोंपड़ी में
गुड़-रोटी खाएँगें।
दुम हिलाते टॉमी को
म्याऊँ-म्याऊँ बिल्ली को
छाछ पिलाएँगे।
आजा, मीठे पके गूलर से
जायका बढाएंगे।

चल, आम की ड़ाली पे
कोयल बनके कुहूकेंगें।
खेत के पानी में
बगुलों को देखकर
तालियाँ बजाएँगे।
आ, शीशम के नीचे से
मोरपंख खोजकर लाएँगें।

चल, लाल-लाल टेशू
झोली भर लाएँगें।
करौंदे के पेड़ से
सुनहरे-लाल-गुलाबी
करौंदे चुनकर लाएँगें।
आजा, ढाके के पत्ते में
पानी पियेंगे।

चल, टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी पर
दौड़ लगाएँगे।
धूल के गुब्बार में
ऊँची उड़ती घास-पात में
सहम के बैठ जाएँगें।
आ, खेत में घुसी घसियारिन को
ढेला मार ड़राएँगें।

चल, आसमान में उड़ती
चील की परछाईं पकड़ेंगे।
भैंस के रैंकने की
दादा के खाँसने की
नकल बनाएँगें।
आजा, गैया के बछड़े से
दौड़ लगवाएँगें।

चल, भैंस की पूँछ पकड़ कर
तालाब पार लगाएँगे।
बचके माँ की झिड़की से
दादी की गोद में
जाके छुप जाएँगें।
आजा, भैया की कॉपी में
कबूतर बनाएँगें।

चल, बुलबुल के पास
मुँडेर पर बैठेंगे।
दीदी के झोले से
लंबा धागा लाकर
पतंग उड़ाएँगें।
वो देख कटी पतंग
आजा लूटकर लाएँगें।

चल, छुपकर-ढूँढकर
चोर-सिपाई खेलेंगें।
नीम तले चौपाल पर
सबको बुलाकर
हल्ला मचाएँगें।
थक गए अब बहुत
दादी कहानी सुनाओ ना........ नॉनस्टॉप

Tuesday, 9 September 2014

दुल्हन ही दहेज है

वर व कन्या दोनों पक्षों के लोग आमने-सामने विराजमान हैं। बीच में मेज फलों-मिष्ठानों से सजी है। दोनों पक्षों के चेहरों पर उल्लास स्पष्ट झलक रहा है। जिससे प्रकट होता है कि बात पक्की हो चुकी है। तभी कन्या का पिता थोड़े संकोच के साथ दबी सी जबान खोलता है-
-"देखिए, बाकी सब बातें तो हो ही चुकी हैं , अब अगर आप लेन-देन के बारे में भी थोड़ा..........।"
इससे पहले कि वर पक्ष की ओर से कोई कुछ बोले, लड़के ने शिष्टतापूर्वक निवेदन किया,
-"माफ कीजिएगा, लेन-देन से यदि आपका  मतलब 'दहेज' से है तो याद रहे मैं दहेज के नाम पर एक खोटा सिक्का भी अपने घर नहीं जाने दूँगा। हाँ आपकी बेटी के लिये आपके दिल में जो अरमान हों, उनमें मैं किसी प्रकार बाधक भी नहीं बनूँगा। बल्कि आप जो कुछ भी करेंगें उसे सम्मान सहित शिरोधार्य करूँगा।"
इस पर कन्या के पिता ने लड़के के माता-पिता की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो उन्होंने भी स्पष्ट सा उत्तर दिया कि जो कुछ उनके बेटे ने कहा, वही उनके भी शब्द हैं। साथ ही दूसरी कई दहेज विरोधी बातें भी सुना डालीं।
लड़के के ऐसे आदर्श वचन सुनकर कन्या पक्ष के सीने फूलकर चौगुने हो गए।
कहने का मतलब यह है कि सब-कुछ खुशी-खुशी तय हुआ और निश्चित समय पर वर पक्ष धूम-धड़ाके के साथ बारात लेकर कन्या पक्ष के द्वार पर जा पहुँचा। धूम-धड़ाका भी अज़ब ही था। बाराती हाथों में दहेज विरोधी नारे लिखे बैनर, तख्ती आदि पकड़े हुए थे। बैन्ड-बाजे पर भी हर संभव जगह दहेज विरोधी पोस्टर-स्टीकर आदि चिपके हुए थे। कुल मिलाकर पूरी बारात, बारात के बजाय कोई दहेज विरोधी रैली लग रही थी।
खैर इस अदभुत बारात की चर्चा के साथ-साथ सभी की जमकर खातिरदारी हुई और हँसी-खुशी सभी रस्में भी पूरी हो गईं । विदाई के समय माहौल में एक स्वाभाविक अवसाद सा छाया हुआ था। द्वार पर "दुल्हन ही दहेज है" "दहेज लेना-देना पाप है" "दहेज लेना बेटा बेचने के समान है" आदि-आदि दहेज विरोधी पोस्टरों, बैनरों से सजी गाड़ी तैयार खड़ी थी। दुल्हे राजा पास ही दोस्तों के साथ खड़े थे तथा दुल्हन रोते-सिसकते हुए अपने परिजनों से गले मिल-मिलकर विदाई ले रही थी। उसकी सिसकियों ने माहौल में कुछ ज्यादा ही उदासी बिखेर दी थी। तभी कन्या पक्ष के पंडित जी की आवाज़ सुनाई दी, -"अरे जल्दी करो भई, दुल्हन को गाड़ी में बिठाओ।"
  -"नहीं,........." अचानक दुल्हे राजा जोर चिल्लाए। क्षण भर पहले की प्रसन्नचित्त मुखमुद्रा अचानक पत्थर के समान दृढ़ता में परिवर्तित हो गई।
-"नहीं, मैं दुल्हन हरगिज नहीं ले जाऊँगा।"
दुल्हेराजा ने उसी दृढ़ता के साथ पुनः फुँफकारते हुए कहा तो जैसे एटम बम  का धमाका हो गया हो और फिर चारों ओर एक नीरव सन्नाटा छा गया। जैसा शायद परमाणु बम गिरने के बाद हिरोशिमा में छाया होगा।
दुल्हन की सिस्कियां गायब। क्षणभर पहले आँखों से अनवरत बह रहे आँसू ऐसे ही गायब हो गए जैसे वीडियो कैसेट प्ले बैक करने पर बाल्टी का पानी वापस नल में जा समाता है। सभी आवाक खड़े एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे।
कुछ क्षणों बाद थोड़ी खुसर-पुसर शुरू हुई तो कन्या के पिता ने साहस बटोर कर दुल्हे के पास जाकर घिघियाते हुए पूछा, -"यह क्या कह रहे हो बेटा, हमसे कुछ गलती हो गई हो तो.......।"
कहते-कहते उनकी सिसकी बँध गई।
-"देखिये, रोने-धोने की कोई जरूरत नहीं, मैंने पहले ही बड़े स्पष्ट रूप से आपसे कह दिया था कि मैं दहेज के नाम पर कुछ भी स्वीकार नहीं करूँगा।"
-"लेकिन बेटा, हमनें भी तो सबकुछ तुम्हारे कहे अनुसार ही तो किया है।" कन्या के पिता ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा।
-"यह देखिए, इतने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है 'दुल्हन' ही 'दहेज' है। अब आप ही बताईये, आपने हमारा कहा कहां किया।" दुल्हे ने कार पर लगा बैनर दिखाते हुए उसी तीव्रता के साथ कहा।
दुल्हे के इन शब्दों को सुनकर सभी के दिमाग झन्ना उठे। परंतु किसी को नहीं सूझ रहा था कि उसे कैसे समझाएं। अचानक दुल्हन अपनी सखियों व अन्य लोगों को दूर धकेलते हुए दुल्हेराजा की ओर लपकी।फिर उसकी आँखों में आँखें डालकर सिंहनी की भाँति दहाड़ते हुए बोली, -"मैं कोई दहेज नहीं आपकी पत्नी हूँ।"
-"तो फिर आओ घर चलें। मैनें तो दहेज ले जाने से इन्कार किया था, पत्नी को थोड़े ही।" दुल्हे ने होठों पर शरारतपूर्ण मुस्कान बिखेरते हुए दुल्हन के कंधों पर हाथ रखकर प्यार से कहा।

Friday, 5 September 2014

टी'चरस डे

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलो बुक पढ़ आइन
फत्ते कहिन चलो बुक पढ़ आइन
हमऊं कहिन चलो बुक पढ़ आइन
सत्ते पढ़िन A बुक
फत्ते पढ़िन B बुक
हमऊं पढ़िन फेसबुक

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब की सेवा करि आइन
फत्ते कहिन चलीं माटसाब की सेवा करि आइन
हमऊं कहिन चलीं माटसाब की सेवा करि आइन
सत्ते दबाईं A लैग
फत्ते दबाईं B लैग
हमऊं दबाईं टेटुआँ ऊंऊंऊंऊं

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं बधाई भेज आइन(माटसाब को)
फत्ते कहिन चलीं बधाई भेज आइन
हमऊं कहिन चलीं बधाई भेज आइन
सत्ते भेजीं SMS
फत्ते भेजीं E-Mail
हमऊं भेजीं बैरंग

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब को कपड़े लिवा लाईं
फत्ते कहिन चलीं माटसाब को कपड़े लिवा लाईं
हमऊं कहिन चलीं माटसाब को कपड़े लिवा लाईं
सत्ते लिवाईं कुर्ता-पाजामा
फत्ते लिवाईं धोती
हमऊं लिवाईं लक्स कोजी(ये अंदर की बात है)

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब को मिठाई खिलाईं
फत्ते कहिन चलीं माटसाब को मिठाई खिलाईं
हमऊं कहिन चलीं माटसाब को मिठाई खिलाईं
सत्ते खिलाईं रसगुल्ला
फत्ते खिलाईं इमरती
हमऊं खिलाईं भादियाया गुड़

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब को घुमा देईं
फत्ते कहिन चलीं माटसाब को घुमा देईं
हमऊं कहिन चलीं माटसाब को घुमा देईं
सत्ते घुमाईं चौपाटी
फत्ते घुमाईं इंडिया गेट
हमऊं घुमाईं कान पकड़ के चूंऊंऊंऊंऊंईं

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं घंटा बजा आइन
फत्ते कहिन चलीं घंटा बजा आइन
हमऊं कहिन चलीं घंटा बजा आइन
सत्ते बजाईं A घंटा
फत्ते बजाईं B घंटा
हमऊं बजाईं दे घंटा अर दे घंटा अर धे घंटा.....

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं गुरु जी को सलाम बजा आइन
फत्ते कहिन चलीं गुरु जी को सलाम बजा आइन
हमऊं कहिन चलीं गुरु जी को सलाम बजा आइन
सत्ते करीं राम-राम
फत्ते करीं नमस्कार

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हमऊं करीं दंडवत :)

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं खिचड़ी बनाईं
फत्ते कहिन चलीं खिचड़ी बनाईं
हमऊं कहिन चलीं खिचड़ी बनाईं
सत्ते लाईं चावल
फत्ते लाईं दाल
हमऊं लाईं गठबंधन

एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं ब्लॉग लिखिन
फत्ते कहिन चलीं ब्लॉग लिखिन
हमऊं कहिन चलीं ब्लॉग लिखिन
सत्ते लिखिल A पोस्ट
फत्ते लिखिल B पोस्ट
हमऊं लिखिल  टी'चरस डे।

Monday, 26 August 2013

मेरी अब तक की टोटल शायरीनुमा तुकबंदी:- [1]

1.चाँद निकला था रात सितारों में मगर,
हम उनकी गली में नज़र लगाये बैठे ही रहे।
दीदार-ए-शमां हुआ ही नहीं,
हम ज़ाम-ए-मौहब्बत लिए बैठे ही रहे।

2. रातें भी होंगी मुलाकातें भी होंगीं
मगर जो बात आज है वो फिर कहां होगी।

3.1
आइने यूँ ही बदनाम हुआ करते
आइनों की नजरों में ना कभी चोर हुआ करते हैं
जब अपनी ही आँखों से ना दिखे सच
आइने बड़े मददगार हुआ करते है

हमको मालूम होता पहले अगर
आइने में उनको देखकर,गज़ल बन जाएगी
शीशमहल ही लाकर दे देते
अब, अब तो रहते हैं वो हर पल नजरों के सामने
बीच में आइना भला कैसे खड़ा कर लें।
......(डा. अरविंद मिश्रा सर के एक फेसबुक फोटो पर)

Tuesday, 20 August 2013

फिर आया त्यौहारों का मौसम


फिर आया त्यौहारों का मौसम
लेकर खुशियां ढेर रंगारंग
पहले तीज़ ने धूम मचाई
घेवर, फेनी, गुँजिया उड़ाईं
राखी लेकर दीदी आई
उसने भी मुँह में ठूँसी मिठाई
जन्माष्टमी का भी मज़ा निराला
दिन भर मुँह में डाला ताला
चंदा मामा देर से आए
लेकिन तब ही लिया निवाला
दशहरा की तो बात ना पूछो
मेघनाद मारा, कुम्भकर्ण मारा
रावण की भी धज्जियां उडाईं
दिन भर खेले मौज़ मनाई
उस पर भी हमको मिली मिठाई
यह लो भैया आई दिवाली
रंगबिरंगी है मतवाली
घर-आँगन सब करो सफाई
रिमझिम को अब दो विदाई
दिन छिपते ही दीप जलाएं
दुशमन-दोस्त सब गले लगाएं
भैया ने फिर फुलझड़ी जलाई
हम सबने फिर खाई मिठाई।

:) :) :) :) :) :) :) :)