जो लोग अपना सारा बचपना बचपन में ही खर्च कर देते हैं वे अक्सर जवानी में जिंदगी खोया करते हैं और बुढ़ापे में जिंदगी ढोया करते हैं। जो लोग ताउम्र अपना बचपन बचाये रखते हैं केवल वही पूरी जिंदगी जी पाते हैं।
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Friday, 11 August 2023
दो पंछी
Tuesday, 18 May 2021
चोटी
Thursday, 5 January 2017
घर
वो घर अब कहाँ रहे
जिनमें जन्मा करतीं थीं
नित नई बुनावटें !
कुछ रिश्तों की
कुछ प्रेम की
कुछ लगन की
कुछ मिलन की
कुछ सबकुछ समेट कर
बन जातीं थीं ऊन की !
वो घर अब कहाँ रहे
जिनमें जन्मा करतीं थीं
अपनत्व की यादें !
कुछ भोर की
कुछ अँजोर की
कुछ राग की
कुछ अनुराग की
कुछ सबकुछ समेट कर
बन जातीं थीं परिवार की !
अब तो बच रह गईं हैं बस
चंद छत-ओ-दीवारें !
जहाँ चलती हैं बातें
कुछ विज्ञापनों की
कुछ माॅल की
कुछ नेताओं की
कुछ अभिनेताओं की
कुछ घुट-मिटकर बन जातीं हैं
बस................ 'बाजार की' !
निरी............... 'बाजार की' !!
केवल............. 'बाजार की' !!!
Monday, 24 October 2016
दीपावली की कहानी
आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊँ
दीपावली की अमर कहानी।
सुनकर तुम ये मत कहना
यह तो भैया बहुत पुरानी।
दीपावली आती हर वर्ष नयी
नित नई है उसकी यह कहानी।
अयोध्या के थे राजा राम
वन में जाकर रहते थे।
संग सीता और लक्ष्मण भ्राता
वचन पिता का भरते थे।
लंका का था राजा रावण
था वह बडा वीर-अभिमानी।
स्वर्ग लोक के देवता सारे
महल में उसके भरते थे पानी।
एक दिवस की बात यह
पाकर वन में सिया अकेली।
छल से बिठा निज रथ में
ले गया मूर्ख-अज्ञानी।
क्रोध भड़क उठा राम-लखण का
बात जब उन्होंने सब जानी।
खींची डोर निज धनुषों की
रावण से लोहा लेने की ठानी।
राम-लखन दोऊ भ्राता
रावण की सेना अनजानी।
महावीर हनुमान मिले तब
सुग्रीव ने भी सहायता करने की मानी।
सुग्रीव था किष्कंधा का राजा
वानर सेना थी उसकी अति भारी।
नल-नील-अंगद-जाम्बवंत
योद्धा थे उसके बड़े बलवानी।
बात-बात में बना पुल सागर पर
हुई रावण को तब हैरानी।
समझाया उसको खूब सभी ने
पर बात ना उसने झुकने की मानी।
मचा घमाशान कई दिनों तक
मिटे योद्धा अनगिण बलिदानी।
मेघनाद-कुम्भकरण ने भी तो
खूब की वानर सेना की हानि।
पर राम-लक्ष्मण के बाणों ने
उनको भी गति दे डाली।
तब निकला किले से राजा-रावण
था वह खूब दंभी-अभिमानी।
राम-रावण संग्राम छिड़ा तब
तीनों लोक में थी लाचारी।
धरती कांपती अंबर डोलता
चलते थे जब उनके वज्र भारी।
एक बाण बडा पैना
जाकर लगा रावण की नाभि में।
मूर्छित होकर गिरा धूलि में
हुआ तत्काल राम को प्यारा।
थी वह तिथि दशमी की
जब वह महाबली दशानन हारा।
इसीलिए तो हमने तब से
इसे दशहरा के रूप में जाना।
चौदह वर्ष का वनवास निबाह तब
राम-लखन-सिया अयोध्या आये।
उनके स्वागत में ही तो
उस दिन थे सबने दीप जलाये।
राम-लखन और भरत-शत्रुघन
प्रजा वसियों ने गले लगाये।
थी कार्तिक आमावश्या उस दिन
जिसको अब हम दीपावली मनाऐं।
दीपावली है त्यौहार प्रेम का
त्याग- तपस्या और बलिदान का।
मंत्र जरा यह अपनाकर देखो
दीपावली होगा हर दिन जीवन का।
***
Wednesday, 18 March 2015
नॉनस्टॉप-बचपन
ओए चल ना
खिली-खिली धूप में
छत पर बैठेंगे।
आसान में उड़ते
कबूतर को देखकर
सपने बुनेंगे।
रंग अगर चुक गए
तितली से ले लेंगे।
चल, सौंधी-सौंधी हवाओं में
मेंढ़ पर बैठेंगे।
खेत से तोड़कर
गन्ना चुसते
बातें घडेंगे।
आ,गन्ने की जड़ उछालकर
बेर तोड़ेंगे।
चल, हाथों में हाथ लेकर
खेतों में घूमेंगे।
नाली में चलते
ट्यूबवेल के पानी में
छपाछप खेलेंगे।
आजा,फूलों पर मँडराती
तितलियाँ पकड़ेंगे।
चल, मटर के खेत से
तोड़ फलियाँ खाएँगें।
चने की पत्तियों से
नरम-नरम डोडियों से
नमक चुराएँगे।
आ ना, मूली-शलगम उखाड़कर
चबा-चबाकर खाएँगें।
चल, पुआल की झोंपड़ी में
गुड़-रोटी खाएँगें।
दुम हिलाते टॉमी को
म्याऊँ-म्याऊँ बिल्ली को
छाछ पिलाएँगे।
आजा, मीठे पके गूलर से
जायका बढाएंगे।
चल, आम की ड़ाली पे
कोयल बनके कुहूकेंगें।
खेत के पानी में
बगुलों को देखकर
तालियाँ बजाएँगे।
आ, शीशम के नीचे से
मोरपंख खोजकर लाएँगें।
चल, लाल-लाल टेशू
झोली भर लाएँगें।
करौंदे के पेड़ से
सुनहरे-लाल-गुलाबी
करौंदे चुनकर लाएँगें।
आजा, ढाके के पत्ते में
पानी पियेंगे।
चल, टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी पर
दौड़ लगाएँगे।
धूल के गुब्बार में
ऊँची उड़ती घास-पात में
सहम के बैठ जाएँगें।
आ, खेत में घुसी घसियारिन को
ढेला मार ड़राएँगें।
चल, आसमान में उड़ती
चील की परछाईं पकड़ेंगे।
भैंस के रैंकने की
दादा के खाँसने की
नकल बनाएँगें।
आजा, गैया के बछड़े से
दौड़ लगवाएँगें।
चल, भैंस की पूँछ पकड़ कर
तालाब पार लगाएँगे।
बचके माँ की झिड़की से
दादी की गोद में
जाके छुप जाएँगें।
आजा, भैया की कॉपी में
कबूतर बनाएँगें।
चल, बुलबुल के पास
मुँडेर पर बैठेंगे।
दीदी के झोले से
लंबा धागा लाकर
पतंग उड़ाएँगें।
वो देख कटी पतंग
आजा लूटकर लाएँगें।
चल, छुपकर-ढूँढकर
चोर-सिपाई खेलेंगें।
नीम तले चौपाल पर
सबको बुलाकर
हल्ला मचाएँगें।
थक गए अब बहुत
दादी कहानी सुनाओ ना........ नॉनस्टॉप
Tuesday, 9 September 2014
दुल्हन ही दहेज है
-"देखिए, बाकी सब बातें तो हो ही चुकी हैं , अब अगर आप लेन-देन के बारे में भी थोड़ा..........।"
इससे पहले कि वर पक्ष की ओर से कोई कुछ बोले, लड़के ने शिष्टतापूर्वक निवेदन किया,
-"माफ कीजिएगा, लेन-देन से यदि आपका मतलब 'दहेज' से है तो याद रहे मैं दहेज के नाम पर एक खोटा सिक्का भी अपने घर नहीं जाने दूँगा। हाँ आपकी बेटी के लिये आपके दिल में जो अरमान हों, उनमें मैं किसी प्रकार बाधक भी नहीं बनूँगा। बल्कि आप जो कुछ भी करेंगें उसे सम्मान सहित शिरोधार्य करूँगा।"
इस पर कन्या के पिता ने लड़के के माता-पिता की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो उन्होंने भी स्पष्ट सा उत्तर दिया कि जो कुछ उनके बेटे ने कहा, वही उनके भी शब्द हैं। साथ ही दूसरी कई दहेज विरोधी बातें भी सुना डालीं।
लड़के के ऐसे आदर्श वचन सुनकर कन्या पक्ष के सीने फूलकर चौगुने हो गए।
कहने का मतलब यह है कि सब-कुछ खुशी-खुशी तय हुआ और निश्चित समय पर वर पक्ष धूम-धड़ाके के साथ बारात लेकर कन्या पक्ष के द्वार पर जा पहुँचा। धूम-धड़ाका भी अज़ब ही था। बाराती हाथों में दहेज विरोधी नारे लिखे बैनर, तख्ती आदि पकड़े हुए थे। बैन्ड-बाजे पर भी हर संभव जगह दहेज विरोधी पोस्टर-स्टीकर आदि चिपके हुए थे। कुल मिलाकर पूरी बारात, बारात के बजाय कोई दहेज विरोधी रैली लग रही थी।
खैर इस अदभुत बारात की चर्चा के साथ-साथ सभी की जमकर खातिरदारी हुई और हँसी-खुशी सभी रस्में भी पूरी हो गईं । विदाई के समय माहौल में एक स्वाभाविक अवसाद सा छाया हुआ था। द्वार पर "दुल्हन ही दहेज है" "दहेज लेना-देना पाप है" "दहेज लेना बेटा बेचने के समान है" आदि-आदि दहेज विरोधी पोस्टरों, बैनरों से सजी गाड़ी तैयार खड़ी थी। दुल्हे राजा पास ही दोस्तों के साथ खड़े थे तथा दुल्हन रोते-सिसकते हुए अपने परिजनों से गले मिल-मिलकर विदाई ले रही थी। उसकी सिसकियों ने माहौल में कुछ ज्यादा ही उदासी बिखेर दी थी। तभी कन्या पक्ष के पंडित जी की आवाज़ सुनाई दी, -"अरे जल्दी करो भई, दुल्हन को गाड़ी में बिठाओ।"
-"नहीं,........." अचानक दुल्हे राजा जोर चिल्लाए। क्षण भर पहले की प्रसन्नचित्त मुखमुद्रा अचानक पत्थर के समान दृढ़ता में परिवर्तित हो गई।
-"नहीं, मैं दुल्हन हरगिज नहीं ले जाऊँगा।"
दुल्हेराजा ने उसी दृढ़ता के साथ पुनः फुँफकारते हुए कहा तो जैसे एटम बम का धमाका हो गया हो और फिर चारों ओर एक नीरव सन्नाटा छा गया। जैसा शायद परमाणु बम गिरने के बाद हिरोशिमा में छाया होगा।
दुल्हन की सिस्कियां गायब। क्षणभर पहले आँखों से अनवरत बह रहे आँसू ऐसे ही गायब हो गए जैसे वीडियो कैसेट प्ले बैक करने पर बाल्टी का पानी वापस नल में जा समाता है। सभी आवाक खड़े एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे।
कुछ क्षणों बाद थोड़ी खुसर-पुसर शुरू हुई तो कन्या के पिता ने साहस बटोर कर दुल्हे के पास जाकर घिघियाते हुए पूछा, -"यह क्या कह रहे हो बेटा, हमसे कुछ गलती हो गई हो तो.......।"
कहते-कहते उनकी सिसकी बँध गई।
-"देखिये, रोने-धोने की कोई जरूरत नहीं, मैंने पहले ही बड़े स्पष्ट रूप से आपसे कह दिया था कि मैं दहेज के नाम पर कुछ भी स्वीकार नहीं करूँगा।"
-"लेकिन बेटा, हमनें भी तो सबकुछ तुम्हारे कहे अनुसार ही तो किया है।" कन्या के पिता ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा।
-"यह देखिए, इतने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है 'दुल्हन' ही 'दहेज' है। अब आप ही बताईये, आपने हमारा कहा कहां किया।" दुल्हे ने कार पर लगा बैनर दिखाते हुए उसी तीव्रता के साथ कहा।
दुल्हे के इन शब्दों को सुनकर सभी के दिमाग झन्ना उठे। परंतु किसी को नहीं सूझ रहा था कि उसे कैसे समझाएं। अचानक दुल्हन अपनी सखियों व अन्य लोगों को दूर धकेलते हुए दुल्हेराजा की ओर लपकी।फिर उसकी आँखों में आँखें डालकर सिंहनी की भाँति दहाड़ते हुए बोली, -"मैं कोई दहेज नहीं आपकी पत्नी हूँ।"
-"तो फिर आओ घर चलें। मैनें तो दहेज ले जाने से इन्कार किया था, पत्नी को थोड़े ही।" दुल्हे ने होठों पर शरारतपूर्ण मुस्कान बिखेरते हुए दुल्हन के कंधों पर हाथ रखकर प्यार से कहा।
Friday, 5 September 2014
टी'चरस डे
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलो बुक पढ़ आइन
फत्ते कहिन चलो बुक पढ़ आइन
हमऊं कहिन चलो बुक पढ़ आइन
सत्ते पढ़िन A बुक
फत्ते पढ़िन B बुक
हमऊं पढ़िन फेसबुक
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब की सेवा करि आइन
फत्ते कहिन चलीं माटसाब की सेवा करि आइन
हमऊं कहिन चलीं माटसाब की सेवा करि आइन
सत्ते दबाईं A लैग
फत्ते दबाईं B लैग
हमऊं दबाईं टेटुआँ ऊंऊंऊंऊं
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं बधाई भेज आइन(माटसाब को)
फत्ते कहिन चलीं बधाई भेज आइन
हमऊं कहिन चलीं बधाई भेज आइन
सत्ते भेजीं SMS
फत्ते भेजीं E-Mail
हमऊं भेजीं बैरंग
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब को कपड़े लिवा लाईं
फत्ते कहिन चलीं माटसाब को कपड़े लिवा लाईं
हमऊं कहिन चलीं माटसाब को कपड़े लिवा लाईं
सत्ते लिवाईं कुर्ता-पाजामा
फत्ते लिवाईं धोती
हमऊं लिवाईं लक्स कोजी(ये अंदर की बात है)
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब को मिठाई खिलाईं
फत्ते कहिन चलीं माटसाब को मिठाई खिलाईं
हमऊं कहिन चलीं माटसाब को मिठाई खिलाईं
सत्ते खिलाईं रसगुल्ला
फत्ते खिलाईं इमरती
हमऊं खिलाईं भादियाया गुड़
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं माटसाब को घुमा देईं
फत्ते कहिन चलीं माटसाब को घुमा देईं
हमऊं कहिन चलीं माटसाब को घुमा देईं
सत्ते घुमाईं चौपाटी
फत्ते घुमाईं इंडिया गेट
हमऊं घुमाईं कान पकड़ के चूंऊंऊंऊंऊंईं
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं घंटा बजा आइन
फत्ते कहिन चलीं घंटा बजा आइन
हमऊं कहिन चलीं घंटा बजा आइन
सत्ते बजाईं A घंटा
फत्ते बजाईं B घंटा
हमऊं बजाईं दे घंटा अर दे घंटा अर धे घंटा.....
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं गुरु जी को सलाम बजा आइन
फत्ते कहिन चलीं गुरु जी को सलाम बजा आइन
हमऊं कहिन चलीं गुरु जी को सलाम बजा आइन
सत्ते करीं राम-राम
फत्ते करीं नमस्कार
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हमऊं करीं दंडवत :)
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं खिचड़ी बनाईं
फत्ते कहिन चलीं खिचड़ी बनाईं
हमऊं कहिन चलीं खिचड़ी बनाईं
सत्ते लाईं चावल
फत्ते लाईं दाल
हमऊं लाईं गठबंधन
एक रहन सत्ते
एक रहन फत्ते
एक रहन हम
सत्ते कहिन चलीं ब्लॉग लिखिन
फत्ते कहिन चलीं ब्लॉग लिखिन
हमऊं कहिन चलीं ब्लॉग लिखिन
सत्ते लिखिल A पोस्ट
फत्ते लिखिल B पोस्ट
हमऊं लिखिल टी'चरस डे।
Monday, 26 August 2013
1.चाँद निकला था रात सितारों में मगर,
हम उनकी गली में नज़र लगाये बैठे ही रहे।
दीदार-ए-शमां हुआ ही नहीं,
हम ज़ाम-ए-मौहब्बत लिए बैठे ही रहे।
2. रातें भी होंगी मुलाकातें भी होंगीं
मगर जो बात आज है वो फिर कहां होगी।
3.1
आइने यूँ ही बदनाम हुआ करते
आइनों की नजरों में ना कभी चोर हुआ करते हैं
जब अपनी ही आँखों से ना दिखे सच
आइने बड़े मददगार हुआ करते है
हमको मालूम होता पहले अगर
आइने में उनको देखकर,गज़ल बन जाएगी
शीशमहल ही लाकर दे देते
अब, अब तो रहते हैं वो हर पल नजरों के सामने
बीच में आइना भला कैसे खड़ा कर लें।
......(डा. अरविंद मिश्रा सर के एक फेसबुक फोटो पर)
Tuesday, 20 August 2013
फिर आया त्यौहारों का मौसम
फिर आया त्यौहारों का मौसम
लेकर खुशियां ढेर रंगारंग
पहले तीज़ ने धूम मचाई
घेवर, फेनी, गुँजिया उड़ाईं
राखी लेकर दीदी आई
उसने भी मुँह में ठूँसी मिठाई
जन्माष्टमी का भी मज़ा निराला
दिन भर मुँह में डाला ताला
चंदा मामा देर से आए
लेकिन तब ही लिया निवाला
दशहरा की तो बात ना पूछो
मेघनाद मारा, कुम्भकर्ण मारा
रावण की भी धज्जियां उडाईं
दिन भर खेले मौज़ मनाई
उस पर भी हमको मिली मिठाई
यह लो भैया आई दिवाली
रंगबिरंगी है मतवाली
घर-आँगन सब करो सफाई
रिमझिम को अब दो विदाई
दिन छिपते ही दीप जलाएं
दुशमन-दोस्त सब गले लगाएं
भैया ने फिर फुलझड़ी जलाई
हम सबने फिर खाई मिठाई।
:) :) :) :) :) :) :) :)
Thursday, 15 August 2013
कितना अच्छा लगता है
कितना अच्छा लगता है
जब मैं आज तिरंगा हूँ
नभ गंगा सा निर्मल है
मैं लहराता गौरी का पल्लू हूँ।
सीना चौड़ा हो जाता है
जब संग शहीद चिता पर चढता हूँ
मस्तक ऊँचा हो जाता है
जब हिम शिखरों पर लहराता हूँ।
जनम सुफल हो जाता मेरा
गर लाज़ बहन की बनता हूँ
दिल खून के आँसू रोता है
जब कफन बगुले का बनता हूँ।
बहुत बुरा लगता है सच
जब झूठ की डोरी बँधता हूँ
दिल ज़ार-ज़ार बस रोता है
जब सलामी दुष्टों की लेता हूँ।
मुझको चिथड़े कर देना, वीरों
गद्दारों के आगे मत झुकने देना
खून से तुम्हारे लथपथ जाऊँ
मत छींटे उनके पड़ने देना।
भारत माँ की शान हूँ मैं
भारत माँ की आन हूँ मैं
बस इतनी विनती करता हूँ
गर खून रगों में हो बाकि
गर आग जिगर में हो बाकि
गर फर्ज वतन का हो बाकि
गर कर्ज दूध का हो बाकि
गर हया आँख में हो बाकि
बस माँ की लाज़ बचा लेना
मुझको गिद्धों से छुड़ा लेना।
कुछ ओर नहीं, कुछ ओर नहीं
मैं ताज़ तुम्हारे सर का हूँ
कितना अच्छा लगता है
जब मैं आज तिरंगा हूँ...
***
Monday, 15 July 2013
एक शब्द
एक शब्द होता है
जो भूले को याद दिला दे,
एक शब्द होता है
जो भटके को राह दिखा दे।
एक शब्द होता है
जो आँखों से मोती बरसा दे,
एक शब्द होता है
जो दिन में तारे दिखला दे।
एक शब्द होता है
जो रोते को मीठी नींद सुला दे,
एक शब्द होता है
जो उड़ते को मिटटी में मिला दे।
एक शब्द होता है
जो लंगड़े को पर्वत लाँघवा दे,
एक शब्द होता है
जो मूर्ख को विद्वान बना दे।
एक शब्द होता है
जो तलवारें खिंचवा दे,
एक शब्द होता है
जो प्रेम का दरिया बहा दे।
एक शब्द होता है
जो पर्वतों को हिला दे,
एक शब्द होता है
जो टूटे दिलों को मिला दे।
शब्दों में बड़ी शक्ति है मित्रों,
इनका प्रयोग करो जरा संभल के।
कमान से निकला तीर तो,
घायल कर सकता बस एक बार।
मगर मुख से निकला शब्द तो,
प्रतिक्षण करता हज़ारों वार।
*****
Wednesday, 3 July 2013
एक विचार
तर्क, मेंढ से गुजरते हुए पडौसी के खेत से बिना पूछे तोडी गई तरकारी के समान होते हैं। आपको नहीं पता होता कि उसने तरकारी किस उद्देशय से बोई हुई थी।
जबकि विचार, खुद अपने खेत में रात दिन निराई-गुड़ाई-सिंचाई की अथक मेहनत से उगाई गई फसल के समान होते हैं।
अत: तर्क-वितर्क निकृष्ट है, विचार-विमर्श उत्कृष्ट।
Thursday, 20 June 2013
ए मेरी नसल के लोगों
प्रदीप जी से क्षमा याचना सहित। परंतु मुझे यह भी विश्वास है कि यदि आपने इसे आज लिखा होता तो ऐसा कुछ ही लिखा होता...
ए मेरी नसल के लोगों
तुम खूब जुटा लो चंदा
यह दुर्दिन है हम सब का
कोई भूख से ना मर जाए बंदा
पर मत भूलो इस धरा पर
जो हमनें ही करीं बरबादीं
कुछ याद वे गलती भी कर लो
जिनसे है ये तबाही आई
जिनसे है ये....
ए मेरी नसल के लोगों
जरा खोल के आँख तुम अपनी
बरबादियां हुईं जो अब तक
जरा याद करो वे कहानीं
ए मेरी....
लगाने थे जब हमें पौधे...
हम लगा रहे थे ए. सी.
जब-जब पड़ी जरूरत हवा की
खिड़की विहीन दीवारे बढ़ा लीं
जब बरखा आई भिगोने
आँगन में भी पत्थर चुना लीं
........
कलकल करतीं थीं जो नदियां
नालों में वो हमने बदल दीं
होते थे जहां बाग-बगीचे
कंक्रीट वहां उगा ली
अरे कैसी की ये मनमनी
अरे कैसी की ये नादानी
कुछ याद वे गलती भी कर लो
जिनसे है ये तबाही आई
जिनसे है....
(संदर्भ:- आजकल की अधिकांश प्राकृतिक आपदाऐं)
Sunday, 16 June 2013
साहित्यिक पहेलियां
1.
'रामचरित' रच तुलसीदास ने
हिंदी पर किया उपकार
'साकेत' भला किसने रच डाली
जरा बूझो तो बड़े सरकार
[मैथिलीशरण गुप्त]
2.
टैगोर जी की बात निराली
'गीतांजली' सी दे गए प्यारी
'कामायनी' है कृति किसकी
पड़ती है जो सब पर भारी
[जयशंकर प्रसाद]
3.
दिनकर जी के ठाठ अनोखे
'उर्वशी' सी ना दूजी दीखे
'आधा गाँव' किसने रच डाला
बताओ जरा तो हम भी देखें
[राही मायूस राजा]
4.
मन चंगा ते तन चंगा
राहुल जी लाए 'वोल्गा से गंगा'
'आनंद मठ' था किसने बनाया
ज्यादा ठीक नहीं इस पर पंगा
[बंकिमचंद्र चटर्जी(बंगला)]
5.
'गोदान' देकर प्रेमचंद ने
हमारी तो दी झोली भर
'माटी मटाल' दे दी किसने
अब रखोगे इसको कहां पर
[गोपीनाथ मोहन्ती (उडिया)]
6.
ताराशंकर बनर्जी आए
लेकर 'गणदेवता' संग
उधर डटा है 'गुनाहों का देवता'
देखकर जिसको सभी हैं दंग
[धरमवीर भारती]
7.
'साखी' रच गए कबीरदास जी
'सूरसागर' सूरदास
दास तीसरे वह कौनसे
'मेघदूत' से किया प्रकाश
[कालीदास]
सामान्य विज्ञान पहेलियां उत्तर :-
1.भाप इंजिन का सिद्धान्त 2.सोडियम 3.उत्प्लावन बल का सिद्धान्त 4.कैक्सटन 1450 5.घर्षण बल 6.पूर्णिमा-आमावश्या 7.नाइट्रस आक्साइड
Tuesday, 11 June 2013
सामान्य विज्ञान पहेलियां
1.
सेब गिरा न्यूटन के सर पे
गुरूत्वाकर्षण की हुई पहचान
ढक्कन खड़का केतली का
तो जेम्स ने किया क्या बख़ान
2.
पानी से मैं जल जाता हूँ
मिटटी के तेल से शर्माता हूँ
नाम तो जरा तुम मेरा बूझो
सारी धरती पर पाया जाता हूँ
3.
इतना बड़ा जहाज़ ना डूबा
छोटा सा पिन डूब गाया
सिद्धांत भला वह कौनसा
जिसने है यह करिश्मा किया
4.
तीसमारखां तुम हो बनते
फाड़ीं तुमने बहुत किताब
प्रिंटिंग-प्रेस कब-किसने बनाई
जल्दी से दो इसका जवाब
5.
फुटबाल को जोर की ठोकर मारी
फिर भी कुछ दूर जाकर रुक जाती
क्यूँ यह हमें ना छोड़ना चाहती
या इसको बिलकुल लाज़ ना आती
6.
राहू-केतु का खेल नहीं यह
चंदा- सूरज की बस लुका-छिपी है
ग्रहण दोनों पडते कब-कब
बताओ हमें भी जिज्ञासा बड़ी है
7.
पूछुँगा तो हँसोगे तुम
मज़ाक भी मेरा उड़ाओगे तुम
क्या कोई ऐसी गैस भी होती
जो हमको गुदगुदी कर जाती
(उत्तर अगली पोस्ट में)
चल सहेली बूझ पहेली के उत्तर :-
1.सुराही 2.प्याज 3.तोहफ़ा 4.गज 5.जल 6.राकेट 7.विद्युत
Friday, 7 June 2013
चल सहेली बूझ पहेली
1.
नार नवेली, बनी पहेली
राज़ ना उसका हमने जाना
आसन जमा बैठी चौकी पर
काम है शीतल जल पिलाना
2.
काटा मुझे तो रोओगे तुम
आँसू खूब बहाओगे तुम
गरीबों की मैं रोटी पर रहती
अमीरों की भी मेज सजाती
3.
जन्मदिन हो या बजी शहनाईं
या जाते हो करने फ़रियाद
सूट-बूट जब पहन लिया
तब आई मेरी याद
4.
दो अक्षर का मेरा नाम
आता हूँ मैं सबके काम
सीधा तो मैं मीटर से छोटा
उलट दिया तो दुनिया सा मोटा
5.
शेर नहीं पर जंगल में भी रहता
अमृत नहीं पर जीवन देता
शीतलता जो भी पानी चाहे
मुझको आकर गले लगाता
6.
आग लगी है पूँछ में मेरी
सरपट दौड़ा जाता हूँ
नाम मेरा तुम बूझो भैया
अंतरिक्ष तक होकर आता हूँ
7.
होकर रानी भरती पानी
किस्मत का यह खेल है भारी
समझ नौकरानी ना करना छेडखानी
दूँगी पटका याद आएगी नानी
(उत्तर अगली पोस्ट पर देख लें)
Tuesday, 4 June 2013
न्यारा कर दो दुनिया वालों
न्यारा कर दो दुनिया वालों
अब निभे ना संग तुम्हारे।
बंगले, मोटर-कार ना लूँगा
टी.वी. विडियो सब छोडूँगा।
ये बिस्तर-गद्दे, ए.सी. कमरे
कभी ना देखूँ इनके सपने।
धन-दौलत से मुझे क्या करना
यह सब भी तुम ही रख लेना।
कामिक्स पढ-पढ़ मन है ऊबा
अब तो चाहूँ मुक्त गगन में उड़ना।
परी-देश की सैर को जाऊँ
संग वहां से ढेरों तितलियां लाऊँ।
बालू रेत का घर बनाकर
मेघों के गद्दे बिछवाऊँ।
रिमझिम में मैं नाचूँ-गाऊँ
कोयल संग मैं सुर मिलाऊँ।
दिन-भर खेलूँ पतंग उड़ाऊँ
फिर बगिया के फूलों में सो जाऊँ।