जो लोग अपना सारा बचपना बचपन में ही खर्च कर देते हैं वे अक्सर जवानी में जिंदगी खोया करते हैं और बुढ़ापे में जिंदगी ढोया करते हैं। जो लोग ताउम्र अपना बचपन बचाये रखते हैं केवल वही पूरी जिंदगी जी पाते हैं।
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Friday, 11 August 2023
दो पंछी
Thursday, 5 January 2017
घर
वो घर अब कहाँ रहे
जिनमें जन्मा करतीं थीं
नित नई बुनावटें !
कुछ रिश्तों की
कुछ प्रेम की
कुछ लगन की
कुछ मिलन की
कुछ सबकुछ समेट कर
बन जातीं थीं ऊन की !
वो घर अब कहाँ रहे
जिनमें जन्मा करतीं थीं
अपनत्व की यादें !
कुछ भोर की
कुछ अँजोर की
कुछ राग की
कुछ अनुराग की
कुछ सबकुछ समेट कर
बन जातीं थीं परिवार की !
अब तो बच रह गईं हैं बस
चंद छत-ओ-दीवारें !
जहाँ चलती हैं बातें
कुछ विज्ञापनों की
कुछ माॅल की
कुछ नेताओं की
कुछ अभिनेताओं की
कुछ घुट-मिटकर बन जातीं हैं
बस................ 'बाजार की' !
निरी............... 'बाजार की' !!
केवल............. 'बाजार की' !!!
Monday, 24 October 2016
दीपावली की कहानी
आओ बच्चों तुम्हें सुनाऊँ
दीपावली की अमर कहानी।
सुनकर तुम ये मत कहना
यह तो भैया बहुत पुरानी।
दीपावली आती हर वर्ष नयी
नित नई है उसकी यह कहानी।
अयोध्या के थे राजा राम
वन में जाकर रहते थे।
संग सीता और लक्ष्मण भ्राता
वचन पिता का भरते थे।
लंका का था राजा रावण
था वह बडा वीर-अभिमानी।
स्वर्ग लोक के देवता सारे
महल में उसके भरते थे पानी।
एक दिवस की बात यह
पाकर वन में सिया अकेली।
छल से बिठा निज रथ में
ले गया मूर्ख-अज्ञानी।
क्रोध भड़क उठा राम-लखण का
बात जब उन्होंने सब जानी।
खींची डोर निज धनुषों की
रावण से लोहा लेने की ठानी।
राम-लखन दोऊ भ्राता
रावण की सेना अनजानी।
महावीर हनुमान मिले तब
सुग्रीव ने भी सहायता करने की मानी।
सुग्रीव था किष्कंधा का राजा
वानर सेना थी उसकी अति भारी।
नल-नील-अंगद-जाम्बवंत
योद्धा थे उसके बड़े बलवानी।
बात-बात में बना पुल सागर पर
हुई रावण को तब हैरानी।
समझाया उसको खूब सभी ने
पर बात ना उसने झुकने की मानी।
मचा घमाशान कई दिनों तक
मिटे योद्धा अनगिण बलिदानी।
मेघनाद-कुम्भकरण ने भी तो
खूब की वानर सेना की हानि।
पर राम-लक्ष्मण के बाणों ने
उनको भी गति दे डाली।
तब निकला किले से राजा-रावण
था वह खूब दंभी-अभिमानी।
राम-रावण संग्राम छिड़ा तब
तीनों लोक में थी लाचारी।
धरती कांपती अंबर डोलता
चलते थे जब उनके वज्र भारी।
एक बाण बडा पैना
जाकर लगा रावण की नाभि में।
मूर्छित होकर गिरा धूलि में
हुआ तत्काल राम को प्यारा।
थी वह तिथि दशमी की
जब वह महाबली दशानन हारा।
इसीलिए तो हमने तब से
इसे दशहरा के रूप में जाना।
चौदह वर्ष का वनवास निबाह तब
राम-लखन-सिया अयोध्या आये।
उनके स्वागत में ही तो
उस दिन थे सबने दीप जलाये।
राम-लखन और भरत-शत्रुघन
प्रजा वसियों ने गले लगाये।
थी कार्तिक आमावश्या उस दिन
जिसको अब हम दीपावली मनाऐं।
दीपावली है त्यौहार प्रेम का
त्याग- तपस्या और बलिदान का।
मंत्र जरा यह अपनाकर देखो
दीपावली होगा हर दिन जीवन का।
***
Tuesday, 20 August 2013
फिर आया त्यौहारों का मौसम
फिर आया त्यौहारों का मौसम
लेकर खुशियां ढेर रंगारंग
पहले तीज़ ने धूम मचाई
घेवर, फेनी, गुँजिया उड़ाईं
राखी लेकर दीदी आई
उसने भी मुँह में ठूँसी मिठाई
जन्माष्टमी का भी मज़ा निराला
दिन भर मुँह में डाला ताला
चंदा मामा देर से आए
लेकिन तब ही लिया निवाला
दशहरा की तो बात ना पूछो
मेघनाद मारा, कुम्भकर्ण मारा
रावण की भी धज्जियां उडाईं
दिन भर खेले मौज़ मनाई
उस पर भी हमको मिली मिठाई
यह लो भैया आई दिवाली
रंगबिरंगी है मतवाली
घर-आँगन सब करो सफाई
रिमझिम को अब दो विदाई
दिन छिपते ही दीप जलाएं
दुशमन-दोस्त सब गले लगाएं
भैया ने फिर फुलझड़ी जलाई
हम सबने फिर खाई मिठाई।
:) :) :) :) :) :) :) :)
Thursday, 15 August 2013
कितना अच्छा लगता है
कितना अच्छा लगता है
जब मैं आज तिरंगा हूँ
नभ गंगा सा निर्मल है
मैं लहराता गौरी का पल्लू हूँ।
सीना चौड़ा हो जाता है
जब संग शहीद चिता पर चढता हूँ
मस्तक ऊँचा हो जाता है
जब हिम शिखरों पर लहराता हूँ।
जनम सुफल हो जाता मेरा
गर लाज़ बहन की बनता हूँ
दिल खून के आँसू रोता है
जब कफन बगुले का बनता हूँ।
बहुत बुरा लगता है सच
जब झूठ की डोरी बँधता हूँ
दिल ज़ार-ज़ार बस रोता है
जब सलामी दुष्टों की लेता हूँ।
मुझको चिथड़े कर देना, वीरों
गद्दारों के आगे मत झुकने देना
खून से तुम्हारे लथपथ जाऊँ
मत छींटे उनके पड़ने देना।
भारत माँ की शान हूँ मैं
भारत माँ की आन हूँ मैं
बस इतनी विनती करता हूँ
गर खून रगों में हो बाकि
गर आग जिगर में हो बाकि
गर फर्ज वतन का हो बाकि
गर कर्ज दूध का हो बाकि
गर हया आँख में हो बाकि
बस माँ की लाज़ बचा लेना
मुझको गिद्धों से छुड़ा लेना।
कुछ ओर नहीं, कुछ ओर नहीं
मैं ताज़ तुम्हारे सर का हूँ
कितना अच्छा लगता है
जब मैं आज तिरंगा हूँ...
***
Monday, 15 July 2013
एक शब्द
एक शब्द होता है
जो भूले को याद दिला दे,
एक शब्द होता है
जो भटके को राह दिखा दे।
एक शब्द होता है
जो आँखों से मोती बरसा दे,
एक शब्द होता है
जो दिन में तारे दिखला दे।
एक शब्द होता है
जो रोते को मीठी नींद सुला दे,
एक शब्द होता है
जो उड़ते को मिटटी में मिला दे।
एक शब्द होता है
जो लंगड़े को पर्वत लाँघवा दे,
एक शब्द होता है
जो मूर्ख को विद्वान बना दे।
एक शब्द होता है
जो तलवारें खिंचवा दे,
एक शब्द होता है
जो प्रेम का दरिया बहा दे।
एक शब्द होता है
जो पर्वतों को हिला दे,
एक शब्द होता है
जो टूटे दिलों को मिला दे।
शब्दों में बड़ी शक्ति है मित्रों,
इनका प्रयोग करो जरा संभल के।
कमान से निकला तीर तो,
घायल कर सकता बस एक बार।
मगर मुख से निकला शब्द तो,
प्रतिक्षण करता हज़ारों वार।
*****
Tuesday, 4 June 2013
न्यारा कर दो दुनिया वालों
न्यारा कर दो दुनिया वालों
अब निभे ना संग तुम्हारे।
बंगले, मोटर-कार ना लूँगा
टी.वी. विडियो सब छोडूँगा।
ये बिस्तर-गद्दे, ए.सी. कमरे
कभी ना देखूँ इनके सपने।
धन-दौलत से मुझे क्या करना
यह सब भी तुम ही रख लेना।
कामिक्स पढ-पढ़ मन है ऊबा
अब तो चाहूँ मुक्त गगन में उड़ना।
परी-देश की सैर को जाऊँ
संग वहां से ढेरों तितलियां लाऊँ।
बालू रेत का घर बनाकर
मेघों के गद्दे बिछवाऊँ।
रिमझिम में मैं नाचूँ-गाऊँ
कोयल संग मैं सुर मिलाऊँ।
दिन-भर खेलूँ पतंग उड़ाऊँ
फिर बगिया के फूलों में सो जाऊँ।